Friday, May 3, 2013



भारतीयों के विदेशी संस्करण 


हाल ही में हुए तीन वाकयों ने इस मुद्दे पर कलम चलाने को मजबूर कर दिया. एक मित्र के भाई पिछले कई सालों से मालदीव में नौकरी करते थे. वो वहां एक कम्पनी में मेनेजर थे. हाल ही में उनका एक दिन फोन आया कि वो भारत वापस आ रहे हैं. भारत वापस आने के बाद उन्होंने वहां जाने से मना कर दिया. उन्होंने बताया कि अब भारतीयों के लिए वहां कई परेशानियां हैं. मालदीव सरकार ने भारतीय कम्पनी जीएमआर को कोर्ट के आदेशों के बावजूद अपने देश में बाहर का रास्ता दिखा दिया और उसकी जगह चाइना की एक कम्पनी ने उन्ही कामों को टेकओवर कर लिया जो पहले भारत की जीएमआर करती थी.
खैर, दूसरा केस शायद सबको ही पता हो. साउदी अरबिया में भारत के कई लोग नौकरी करने जाते हैं. साउथ से कई लोग बहुत सालों से वहां नौकरी कर रहे थे. अब वहां निताकत नाम का एक कानून लागू हो गया जिसके तहत साउदी अरब की नौकरियों में वहां के ही लोगों को वरीयता दी जायेगी और पैसे भी कहीं ज्यादा देने होंगे. इससे भारतियों की नौकरी में कटौती की गयी, छंटनी की गयी और वहां के लोगों को भर्ती किया गया. पिछले महीने से अब तक भारतीय लोग वहां से वापस आ रहे हैं.
तीसरा घर के पास के ही एक सज्जन का है. एक लड़का जो दिल्ली की एक कम्पनी में बड़ी पोस्ट पर है. किसी लड़की से कई सालों से अफेयर था. शादी की बात हुई. लेकिन, अचानक ही लड़की की शादी के लिए किसी एनआरआई का रिश्ता आ गया. लड़की के घरवालों ने उसको वरीयता दी और अब लड़की शादी करके दुसरे देश उड़ान भरने को तैयार है.
सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य लेकिन बचपन से ही मैंने कान्वेंट स्कूल की शक्ल देखी थी. मेरे कई मित्र थे जो हिंदी की क्लास में पीछे की सीट पर सो जाया करते थे. उनका सपना तो बाहरवीं के बाद भारत छोड़ किसी और देश में जाने का था. वो दिन भर बाहर के देशों का राग अलापते थे. भारत की विभिन्न बुराई गिनाते थे. रॉक एवं पाप सांग गाते थे. अमरीका के झंडे को अच्छा बताते थे. और मैं यकीन के साथ कहता हूँ कि आप लोगों के पहचान में भी ऐसे कई बेवकूफ भरे होंगे. उनके लिए ये देश माँ समान या भगवान् समान नहीं बल्कि एक दलदल मात्र है. उन्होंने इस बात पर गर्व है कि वो फर्राटेदार अंग्रेजी में चपरा लेते हैं. उनके घरवालों को इस बात पर गुरूर था कि उनके बच्चों के कुछ दोस्त भारत से बाहर के हैं. काशी के घाटों पर देखा, अंग्रेजों से कुछ लोग भारत की तारीफ नहीं बल्कि उनके ही देश की तारीफ कर दिया करते हैं. वैसे मैं थोडा फक्कड़ किस्म का इंसान हूँ. लोगों से मिलना, जुलना, चीख चीख के अपने विचारों को झेलने पर मजबूर कर देना मेरी आदतों में शुमार है. इसलिए अक्सर ऐसे लोग मिल जाते हैं जो केवल और केवल भारत की बुराई करते हैं. उनकी जुबान पर अक्सर ये रहता है,
“भारत में कुछ नहीं, भारत की फ़िल्में गन्दी, भारत के लोग गंदे, भारत के नेता गंदे, भारत की जगह गन्दी आदि आदि”
आज भी कई ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ इसलिए गुरूर है कि उन्हें हिंदी बोलनी नहीं आती. जो अंग्रेजी को पढ़े लिखे का पैमाना समझ लेते हैं.
बेहतर है कोई ऐसा कानून बने जो इन लोगों को इनके पसंदीदा देश की सिटिज़नशिप दिलवा दे और नमस्ते बोलके कह दे कि “फिर न आना इस देश”. कम से कम बचे लोगों में देश के लिए कुछ तो प्रेम भावना होगी. लेकिन दुसरे देशों की इस मामले में तो तारीफ करूँगा कि वहां के लोग अपने देश की बुराई नहीं सुनते. भले ही वो बड़ा देश अमरीका हो या बदनाम देश पाकिस्तान. अजीब ही बात है कि हम लोग खाते यहाँ का है और वाह वाही करते हैं दुसरे देश की. आखिर इसे कहते हैं देशप्रेम. झंडा लेकर स्वतंत्रता दिवस पर अखबार में फोटो खिंचा ली और अगले ही दिन फिर शुरू कर दी देश की बुराई. ये लोग क्यों भूल जाते हैं कि अगर नेहरु, गाँधी ने भी ये सोच लिया होता तो आज भी देश फिरंगियों के हाथों में होता. अगर अब्दुल कलाम साहब ने ये सोच लिया होता तो हमारे यहाँ बनी मिसाइलें आज दुसरे देश में बनती और हम पर दागी जाती. मैं तो उस जगह से हूँ जहाँ बिस्मिल्लाह खान साहब जैसी हस्तियाँ थी जिन्हें पूरा विश्व जानता था और उन्हें शेहनाई बजाने के लिए न्योता देता था लेकिन वो अपनी शर्तों पर जाते थे. जब उनका अंतिम समय था तब भी वो छोटे से घर में थे जबकि चाहते तो पूरी जिंदगी में न जाने कितने महल, न जाने कितने देशों में बना लिए होते.
आस्ट्रेलिया की घटना याद है ना किस तरह से भारतीय छात्र पर नस्लीय हमला हुआ था. मालदीव, सउदी अरब, दुबई में भी काम करने जैसे हालत नहीं. ऐसा खुद वहां से लौटे लोग बताते हैं. इंडिया टुडे के एक अंक में साउदी अरब से वापस लौटे लोगों के साक्षात्कार छपे हैं. यदि हो तो देखिएगा. और बात ये भी सही है कि हम भारतीय खुद में इतना दमखम रखते हैं कि पूरी दुनिया को अपने हुनर का लोहा मनवा सके. हाल ही में एक भारतीय इंजिनियर को बिल गेट्स के बाद सबसे ज्यादा बोनस दिया गया. 
हमने इस मिटटी में जन्म लिया है. माना कि देश में हज़ार कमियाँ होंगी लेकिन अगर हमारे घर में कमी है तो उसे हमें सुधारना है ना कि दूसरी देश में पलायन करना है. दुसरे देशों से सीखना तो अच्छा है लेकिन सीखकर अपने देश में इस्तेमाल करा जाए तो बेहतर है. जब तक हम ही अपने देश पर गर्व नहीं करेंगे तो सामने वाला क्यों हमारे देश को महत्त्व देगा?
लोग शायद हमारी इसी कमजोरी का फायदा अक्सर उठाते रहते हैं. कई लोग ये जानते हैं कि हमारे कुछ लोगों की देशभक्ति केवल युद्ध के समय थोड़े देर के लिए जाग्रत होती है . जय हो . उम्मीद है फिरंगियों के ये भारतीय संस्करण जल्द ही सुधरेंगे. 
कहीं दंगों की राजनीति तो कहीं नंगों की 

इन दिनों देश की दो बड़ी पार्टियों के पास दो ही मुद्दे नज़र आते हैं। जहाँ एक तरफ सत्ता पर काबिज़ कांग्रेस के घोटालों और भ्रष्टाचार पर विपक्ष में बैठी  भाजपा खुलकर निशाना साधती है तो कभी विदेश नीति की विफलता और महंगाई पर अपनी  तीखी प्रतिक्रिया देती है. लेकिन भाजपा के उच्च कोटि के नेता ये भूल जाते हैं कि इनके शासन में इनके ही नेता बंगारू लक्ष्मण कैमरे के सामने मात्र एक लाख रुपये लेते हुए देखे गए थे. इनके साथ रहे कर्णाटक के येदुरप्पा और बेल्लारी बंधू अवैध खनन के काम में सालों से लिप्त है। महंगाई की
बात करी जाए तो भाजपा सरकार में प्याज के दामों की वजह से हुई छीछालेदर तो सबको याद होगी ही। क्या कंधार हाइजेक काण्ड में छोड़े गए आतंकियों के मुद्दे को विदेश नीति की विफलता नहीं माना जा सकता? आज वो ही आतंकी भारत के खिलाफ हजारों आतंकियों को ट्रेनिंग दे रहा है और हर रोज भारत के पतन के तरीके ढून्ढ रहा है. 
दूसरी तरफ जैसे जैसे भाजपा में मोदी का कद बढ़ रहा है और शीर्ष के नेता भी मोदी के नाम के जयकारे लगाते  दिख रहे हैं कांग्रेस और उसके चाहने वाले भाजपा की हिंदुत्व छवि और गुजरात में हुए दंगों पर राजनीति कर वोट बैंक बांटने में जुटे हैं . गुजरात में जो 2002  में हुआ वो बेहद निंदनीय था और मानवता को शर्मशार कर देने वाला था . हालाँकि मोदी ने ये तक कह दिया कि अगर वो गुनेहगार निकले तो उन्हें बीच सड़क पर फांसी दे दी जाये. ये अलहदा बात है लेकिन कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष बनकर प्रचार कर रही है लेकिन इतिहास के पन्नों को कुरेदने पर पता चलता है कि कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्ष का चोला सिर्फ वोट बैंक के लिए पहना है जैसा अब भाजपा कर रही है . कांग्रेस के नेता और भारत का बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग आखिर गुजरात के उन 1969 के दंगों को क्यों भूल जाते हैं जिनमें 2000 लोगों की जानें गयी थी..लाखों लोगों का घर बर्बाद हुआ था..तब कांग्रेस के हितेंद्र देसाई मुख्यमंत्री थे . लेकिन शायद ही कोई अब  इन दंगों का  जिक्र करता हो. क्या ये निंदनीय नहीं? क्या कई साल बीत जाने से पार्टी धर्मनिरपेक्ष ब्रांड हो जाती है? चलिए थोडा और देखें तो 1980 में मुरादाबाद में हुए दंगों में लगभग दो हज़ार लोग मरे थे तब भी कांग्रेस शासन था ..1984 के सिख विरोधी दंगे तो आजकल फिर सुर्ख़ियों में हैं . भागलपुर में 1989 में हुआ दंगों अब तक के दंगों से कहीं ज्यादा वीभत्स है..इसमें भी कांग्रेस राज कर रही थी ..1985 में फिर गुजरात में दंगे हुए तब भी कांग्रेस शासन में थी ..
1967 में रांची में हुए दंगे में सैकड़ों लोग मरे तब भी कांग्रेस शासन था ..

सत्य तो ये है कि नेता हाथ में डमरू लिए हमारे पास आते हैं और हम इनके डमरू पर नाचते दीखते हैं. किसी पार्टी को घोटाले की वजह से खींचते हैं और दुसरे के वोट बैंक बन जाते हैं और किसी को धर्म के नाम पर खींचकर उससे मूंह फेर लेते हैं जबकि ये सारे मुद्दे, आरोप, बुराइयां हर पार्टी में मौजूद हैं . 

लेकिन हम इनकी चाल का शिकार होते रहते हैं और इसलिए ये नेता अपनी चाल बदलना भी नहीं चाहते . 
अंत में बस कुछ पंक्तियाँ कहूँगा,

ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
गरीब महंगाई से मर रहा हो तो नहीं आ पाते,
पर उद्योगपति के बुलावे में "आ" जाते हैं...
अमीरों के महलों को खड़ा करवाने के खातिर,
गरीबों की बस्ती "जला" जाते हैं...

ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
समाजवाद की आड़ में बढ़ाते हैं पूँजीवाद,
और धन का लालच देकर वोट "पा" जाते हैं,
हम गरीबों पर बढ़ा कर टेक्स का बोझ,
सारी कमाई चटकारे लगा कर "खा" जाते हैं...

ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
मुझ जैसे गरीबों के वोट के खातिर,
मेरी बस्ती में आकर "गिड़गिड़ा" जाते हैं,
और जीतने के बाद गर हम मिलना चाहें,
तो सामने से ठेंगा "दिखा" जाते हैं....

ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
बात करते हैं "सुशासन" की चिल्ला चिल्ला कर,
पर देश के "दुशासन" की फाइलें दबा जाते हैं,
पेट्रोल की कीमत चंद पैसे कम करके,
देश भर की मीडिया में "छा" जाते हैं...

   

Tuesday, April 30, 2013

सिस्टम का बला-त-कार 

दिल्ली में पांच साल की गुड़िया के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आते ही जनता का आक्रोश फूट पड़ा। 16 दिसंबर को  दामिनी के साथ हुए बलात्कार के बाद उपजा देश की जनता का गुस्सा अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि पांच साल की बच्ची के साथ जघन्य बलात्कार की घटना सामने आ गई। हालांकि इस बीच पूरे देश में कई बलात्कार की घटनाएं सामने आर्इं और संसद में बैठे नीति निर्धारकों ने इस मुद्दे पर बहस करने के साथ ही कानून में भी संसोधन किए लेकिन इसके बावजूद ऐसी घटनाएं अनवरत जारी रहीं। लेकिन लोगों का गुस्सा
अंग्रेजों ने पुलिस का गठन सुरक्षा के साथ ही भारतीय जनता को डराने और उनसे गुलामी करवाते रहने के लिए किया था। आज तक पुलिस की ट्रेंनिग में कुछ खास सुधार नहीं हुआ और अब स्वतंत्र भारत में भी मानो अंग्रेजों की पुलिस तैनात है जो आए दिन जनता का शोषण करती रहती है। हालांकि पुलिस सुधार के नाम पर कई सेमिनार आए दिन होते रहते हैं कि लेकिन उसका नतीजा क्या होता है इसका अंदाजा इन घटनाओं से लगाया जा सकता है। एक ऐसा समय जब देश के हर कोने से महिला सशक्तीकरण की मुहिम को मजबूती मिल रही हैं, उसी समय अब पुलिस सुधार की मांगे भी उठ रही हैं।
इस बार बलात्कार के विरोध में तो था ही लेकिन पुलिस के अभद्र रवैये ने एक नई बहस और गुस्से को जन्म दे दिया। अस्पताल में कुछ लड़कियां बच्ची को देखने और उसे एम्स में भर्ती कराने की मांग को लेकर पहुचीं।
लेकिन दिल्ली पुलिस में एसीपी अहलावत ने अपनी वर्दी का गुरुर दिखाते हुए सारी सीमाएं लांघ डाली और
लड़की को दो जोरदार चांटे मार दिए। लड़की के कान से खून निकलने लगा। जिसने भी ये नजारा देखा, सकते में आ गया। लोगों का गुस्सा अपराधी को पकड़ने और सजा दिलाने से शुरु हुआ था जिसमें पुलिस सुधार के मुद्दे को जोड़ दिया गया। अभी इस घटना को कुछ ही घंटे बीते थे कि उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से भी कु छ ऐसी ही खबर आने लगी। यहां भी रक्षकों ने मानवता को तार तार करते हुए पुलिसिया वर्दी पर दाग लगवाया। अलीगढ़-दिल्ली रोड के बन्ना देवी थाना क्षेत्र में छह साल की बच्ची की मौत को लेकर लोग आक्रोशित हो गए। उसकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि मासूम बच्ची के साथ रेप हुआ और उसकी गला दबाकर हत्या कर दी गई। विरोध प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर पुलिस ने जमकर लाठियां भांजी। अलीगढ़ में यूपी पुलिस का जो चेहरा सामने आया है उससे यूपी की कानून व्यवस्था की कलई खुली है। एक मासूम बच्ची के साथ रेप हुआ, परिजनों ने इंसाफ मांगा तो लाठियां मिलीं और फिर एसएसपी का बेतुका बयान सामने आया। हत्या और बलात्कार के बाद घरवालों के जख्म पैसों से भरने की कोशिश की जाने लगी। प्रशासन ने परिवार को 20 हजार का चेक दिया है तो आंसू पोंछने आए एक नेता ने पांच हजार रुपये पकड़ा दिए। हालांकि दोषी पुलिसकर्मियों को संस्पेंड किया गया लेकिन इसने एक बड़ा प्रश्न लोगों के सामने खड़ा किया कि क्या ऐसे वर्दीधारी समाज में महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित कर पायेंगे जो महिलाओं की इज्जत करना ही नहीं जानते? जो महिलाओं पर हाथ उठाकर अपनी मर्दानगी और वर्दी का रौब दिखाते हैं। ये तो चंद पुलिसकर्मी थे जो सामने आ गए। लेकिन ये बात भी सब जानते हैं कि पुलिस विभाग में ऐसे लोगों की एक लंबी फौज है जो आज भी जनता का शोषण किसी न किसी तरीके से कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले दिनों शोषण की शिकायत लेकर एक लड़की थाने पहुंची तो पुलिसवालों ने उसे ही हवालात में डाल दिया। आए दिन पुलिस की कारगुजारियों के किस्से सामने आते रहते हैं लेकिन सुधार के नाम पर आज तक कुछ नहीं हुआ।

Friday, December 21, 2012


तस्वीर बदलकर विरोध?? तस्वीर काली या मन काला??

रोज सुबह घर से पूरा मेकअप करके निकलने के ज़माने में रहने वाले लोग आजकल दिल्ली में हुए बलात्कार के विरोध में अपना उबाल इन्टरनेट के माध्यम से दर्ज करा रहे हैं. काली तस्वीर लगाकर, पोस्ट करके, ग्रुप बनाकर, पेज बनाकर. लेकिन गहरा सवाल ये है की क्या इससे उस लड़की को इन्साफ मिल जाएगा जो आज जिंदगी और मौत की जंग से जूझ रही है?? या फिर उन मनचलों की सेहत पर कोई फर्क पड़ेगा जो हर गली से निकलने वाली लड़की पर छीटाकांशी करते हैं?? कई लोगों ने तरो फेसबुक पोस्ट में लड़की का नाम तक उजागर कर दिया जिसके साथ बलात्कार हुआ है. भय होता है की कहीं कोई फेसबुक पर अपनी भावनाएं दिखाने के चक्कर में उसकी तस्वीर न डाल दे. कल शहर में कई जगह लोग मोमबत्ती जलाकर विरोध कर रहे थे लेकिन हाँ उनका ध्यान मोमबत्ती से ज्यादा उन कैमरों पर था जिसकी बदौलत अगले दिन अखबार के पेज उनकी तस्वीरों से रंगे नज़र आते?? वैसे सबसे बड़ा मुद्दा तो ये है की फेसबुक पर तस्वीर बदलने वालों में से कई ऐसे हैं जिनकी मानसिकता लड़किओं की तस्वीर पर उनके कमेन्ट से झलक जाती है, कुछ तो मेसेज में लड़की को इस कदर परेशान करते हैं की उन्हें तंग आकर ब्लाक करना पड़ता है. क्या इस तरह के लोग तस्वीर बदलकर समाज बदलेंगे?? मैं अभी उस जगह नहीं की मैं कुछ कर सकूँ इसलिए हाँ न मैं तस्वीर बदलता हूँ, न ही मैं मोमबत्ती जलाता हूँ. लेकिन हाँ मन ही मन ये प्रार्थना करता हूँ की जिसके साथ ये सब हुआ भगवान् उसे नयी जिंदगी से नवाजे. उसके घर वालों को इस मुश्किल हालत से लड़ने की ताकत दे.
तस्वीर तो सफ़ेद भी चलेगी लें मन काला नहीं...हम तस्वीर बदलते हैं, सड़क पर आते हैं लेकिन जब बारी वोट देकर ऐसे लोगों को बदलने की होती है जिन्हें निठारी काण्ड भी मामूली लगता है तब हम पीछे हो जाते हैं..पहले उन्हें हटाते हैं, फिर चुनते हैं..फिर हटाते हैं, फिर चुनते हैं..न हम विकल्प बनाना चाहते हैं, न कोई बनना चाहता है...
मेरे विचार अगर गलत लगे हो तो....भी ये मेरे विचार हैं.
धन्यवाद

Monday, January 24, 2011

क्या सुरक्षित है बालिका..बालिका दिवस पर विशेष

आज बालिका दिवस है इसलिए आज इस लेख को लिखने का एक औचित्य है| केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यौन रक्षा विधेयक-२०१० को मंजूरी देकर कामकाजी महिलाओं को काफी हद तक राहत दी है पर सोचने वाली बात है कि आम महिला जो रस्ते पे चलती है, आम लड़की जो पढने ज़ाती है, जो किसी के घर पे काम करती है वह आये दिन शोषण का शिकार होती है| कभी विधायक अपनी नौकरानी के साथ बलात्कार करते हैं तो कभी बड़ा फिल्म स्टार ऐसे कारनामे करता है| इसके अलावा और भी कई तरीके से आये दिन स्त्रियाँ किसी न किसी रूप में प्रतारना का शिकार होती हैं| रास्ते चलती लड़की को देख सीटी मारना, भद्दे तरीके के शब्द इस्तेमाल करना, छेड़ना तो जैसे फैशन बन चुका है| चाहे वो रिक्शा चालक हो,गली में बाल बिखरा के घूमता युवक हो या फिर लग्जरी गाडी में चलता हुआ कोई धन्ना सेठ, लड़कियों की इज्ज़त करना बहुत कम ही लोग जानते हैं| कई बार तो यह मनचले लड़कियों का पीछा करते करते इनके घर तक जाने से भी बाज नहीं आते| पर इस बात का विरोध बहुत कम लड़कियां ही करती हैं क्यूंकि कई बार आरोप लगाने वाली लड़की को ही शक के दायरे में डाल दिया जाता है और उसके ही चाल चलन पर सवाल उठा दिए जाते है| लड़कियां खुद ही और अपने परिवार की इज्ज़त के डर से किसी भी तरह की शिकायत करने की वजह इन सबको नजरअंदाज कर देती हैं|हाल ही में आगरा में एक घटना सामने आई जिसमे की कुछ लड़कों ने एक लड़की को छेड़ा और अपने साथ चलने को कहा| विरोध करने पर लड़की को बाल पकड़कर सरेआम पीटा गया और वह मनचले भाग निकले| अगले ही दिन फिर ऐसी घटना सुनने को मिली| कुछ ही दिन बीते थे कि एक लड़की जोकि जयपुर से परीक्षा देकर लौट रही थी उसे कुछ लोगों ने बाँध दिया और उसके पर्स से ऐटीएम निकलकर पासवर्ड पूछकर ४०००० रुपये निकलकर उसे तालाब के किनारे फेंक के चले गए| बांदा के शीलू बलात्कार मामले से तो कोई भी अनजान नहीं जिसमे विधायक जो कि आरोपी थे उन्हें तो ३२ दिन गिरफ्त में लिया गया और पीड़ित को फर्जी केस बनाकर अगले ही दिन सलाखों के पीछे डाल दिया गया| ऐसा ही एक और मामला अभी सामने आया है जिसमे भरताना के बीएसपी विधायक शिव प्रसाद यादव का नाम सामने आया है| क्या यह है आज हमारी सशक्त नारी की पहचान?? सीता,गार्गी,रानी लक्ष्मी बाई, कल्पना चावला जैसी महान स्त्रिओं की जन्मभूमि पर स्त्रिओं का यह कैसा हश्र है?? कुछ लोगों के लिए औरत सिर्फ दिल बहलाने वाली चीज है तो कुछ stylish बाल बिखरते हुए नए जवान लड़के कहते हैं "लड़कियों को उनकी औकात दिखानी चाहिए..वह हमेशा लड़कों से पीछे रहेंगी" पर वह यह भूल जातें हैं की उन्हें जन्म देने वाली भी कोई लड़की थी और रक्षाबंधन वाले दिन उनकी कलाई पर राखी बंधने वाली भी एक लड़की ही है| चार-चार लड़कियों से झूठे झूठे वादे करके अपने आप को रहीस समझने वाले ये भूल जाते हैं कि उन्हें भी संतान के रूप में लड़की ही मिल सकती है| पर नहीं इतनी लम्बी सोच रखता ही कौन है?? फैसबुक पे अभी हाल ही में किसी ने चाचा नेहरु की तस्वीर किसी औरत के साथ लगायी और उसके नीचे लोगों के भद्दे भद्दे comments और गाली-गलोच लिखी| पर ये फूहड़ लोग ये भूल गए की आज देश में बहुत से नौजवान लड़कियों को छेड़ते रहतें हैं और उन्हें यह तक नहीं पता की देश के प्रधानमंत्री कौन हैं??उनकी अपनी ही दुनिया है जिसमे असली मुद्दों की कोई जगह नहीं|पर नहीं जो अपनी जिंदगी जीकर जा चुका है लोग उसकी गलतियाँ निकालते हैं, खुद के अन्दर झाँक के देखने की कोशिश भी नहीं करते| अब जरुरत है इन सबको रोकने की और इसके लिए हम सबको आगे आना होगा, पहल करनी होगी| अब valentine day का विरोध करने वालों को भी यह समझ लेना चाहिए की असली मुद्दा वह नहीं जो वह उठा रहें है असली मुद्दे कुछ और ही हैं, उन्हें भी इस मुद्दे पर आन्दोलन करना चाहिए| प्रशासन को भी इन घटनाओं की तरफ ध्यान देना चाहिए और आरोपियों के खिलाफ शक्त से शक्त कार्यवाही करनी चाहिए ताकि सबके घर की औरतें चैन से निकल सकें| नारी पुरुष की कमजोरी तो हो सकती है पर कमजोर कभी भी नहीं हो सकती इसलिए अब नारीओं को भी सजग होना पड़ेगा और इन घटनाओं को आड़े हाथ लेना चाहिए तभी स्तिथि में सुधार आएगा|
अब आखिरी में में फिर वही बात कहूँगा की अगर आपको मेरे विचार गलत लगे हो या कुछ भी हो जो कि ठीक न हो तो मुझे अवश्य बताएं| में उसमे सुधार कि पूरी कोशिश करूँगा| आप मुझे SAGARGUJRATI1@GMAIL.COM पर लिख सकतें है| मेरा ब्लॉग पड़ने के लिए धन्यवाद| फिर मिलेंगे|
आपका आभारी,
सागर गुजराती

Friday, January 21, 2011

धोबी घाट- किरण का असफल प्रयोग

Mr. Perfectionist आमिर खान जिन्होंने लगान,मंगल पाण्डेय,गजनी,थ्री इडियट्स जैसी शानदार,संदेशपूर्ण और मनोरंजक फिल्मों से दर्शकों के मन में एक ख़ास पहचान कायम की उनकी इस नयी फिल्म "धोबी घाट" को देखने जाने के लिए मैं आपको एक वजह भी नहीं बता सकता| ऐसा प्रतीत होता है कि आमिर ने ये फिल्म अपनी पत्नी किरण राव की भावनाओं में बह कर की है| आमिर खान  एक जबरदस्त अभिनेता हैं ऐसा सब जानते हैं पर यहाँ लगता ही नहीं कि उन्होंने अभिनय किया है| केवल "हाँ","ना","सार्री" और कुछ छोटे छोटे संवादों को बोलने के अलावा उन्होंने कुछ नहीं किया| किरण आमिर से अभिनय नहीं निकलवा पायीं और आमिर जिनकी हर अगली फिल्म पुरानी फिल्म से कहीं ज्यादा अच्छी होती है, ये फिल्म बहुत ज्यादा हल्की नजर आई| १ घंटा ४५ मिनट की इस फिल्म में न ही कोई ख़ास है, न ही गाना और ना ही कुछ ऐसा जो दर्शकों को लुभा पाए| आगरा शहर में ये किसी भी सिंगल स्क्रीन में नहीं लगी और मल्टीप्लेक्स में भी ज्यादा दर्शक नहीं बटोर सकी| फिल्म पूरे परदे पर नहीं दिखती है और ऐसा लगता है की आमिर पहले ही इस फिल्म का हश्र जानते थे इसलिए उन्होंने इसका प्रचार नहीं किया| कहाँ गजनी में उन्होंने दिल्ली में जाकर बाल काटे थे, थ्री इडियट्स में वेश बदलकर बनारस और कोल्कता जैसे शहरों में घूमे थे पर धोबी घाट में शांत पड़ गए| वो जानते थे की फिल्म का कोई औचित्य या नैतिक शिक्षा नहीं है| इसको बहुत ही शांत ढंग से रीलिज किया गया| मुम्बईया प्रष्टभूमि पर बनी फिल्म आखिरकार क्या दिखाना चाहती थी ये समझने में असफल रहे| मुम्बई पर और भी फिल्म बनी है जैसे प्राण जाये पर शान न जाये, वंस अपोन अ टाइम इन मुम्बई, वास्तव,सत्या जिनमे मुंबई के अलग अलग मुद्दों को बड़े ही बेहतरीन ढंग से पेश किया है| पर धोबी घाट समझने में खासी दिक्कत हुई|

कहानी मुंबई से शुरू होती  है| arun (आमिर खान) एक पेंटर हैं और अपनी पत्नी को तलाक देकर मुम्बई में रहते हैं पर ये तलाक वाली बात हमें आधी फिल्म में पता चलती है| आमिर एक प्रदर्शनी लगते हैं जिसमे उनकी मुलाकात शाई(मोनिका डोगरा) से होती है जो की पेशे से इन्वेस्टमेंट बनकर है और अमेरिका से मुंबई एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में आई हैं| वह फोटोग्राफी की भी बहुत शौक़ीन हैं| मुलाकात के बाद वह आमिर खान के साथ उनके घर चली ज़ाती हैं और नशे में धुत्त दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाता है| अगली सुबह अरुण शाई को सॉरी बोलता है और कहता है की वो कोई रिश्ता उससे नहीं रख सकता| शाई गुस्साकर चली ज़ाती है| आमिर को खुल के नशा करते दिखाया गया है और शुरू में बस एक लाइन दिखाई है    "CIGGARATE SMOKING IS INJURIOUS TO HEALTH" जोकि बहुत कम लोग पढते है| मुन्ना एक धोबी है जो की अभिनेता बनने के सपने से मुंबई आया था| लेकिन ख़ास बात ये है की इसे कभी भी audition तक देते नहीं दिखाया| वह रात में डंडा लेकर निकलता है और क्या करता है ये ढंग से समझ नहीं आया| बस फिल्म के आखिरी कुछ पल में उसे चूहा मरते दिखाया है| अरुण अपना घर बदल लेता है| शाई मुन्ना के जरिये अरुण का पता जानने की कोशिश करती है और एक पल पे ऐसा लगता है की वह अरुण से प्रेम करती है पर मुन्ना के प्रति उसका झुकाव देखकर इस बात को पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता| बिट्टू इसी बीच शाई से प्रेम करने लगा था| यह सब झोलम झोल देखकर लगा की शायद ये प्रेम कहानी होगी| पर मैं गलत निकला,ऐसा तो कुछ नहीं था| इसी बीच अरुण को अपने नए घर में कुछ सामान मिलता है जिसमे कि घर में पहले रहने वाली औरत की बनायीं हुई videos थे जो उसने अपने भाई के लिए बनायीं थी| अरुण उन्हें देखते हैं और उनसे जुड़ जाते है| आधी फिल्म की खपत इन  videos में ही हो गयी| अंतिम  विडियो में नसीमा बताती है की उसके पति ने दूसरी शादी कर ली है और कहती है की ये उसका आखिरी  विडियो है| आमिर सोचते हैं की नसीमा ने पंखे से लटककर जान दे दी थी और वह फूट  फूट कर रोतें हैं और अपना घर बदल लेतें हैं| इधर शाई भी अलग चली ज़ाती है और मुन्ना भी| मुन्ना शाई को अरुण का नया पता देता है पर शाई उसपर ध्यान नहीं देती| कहानी ख़तम होती है|
प्रतिक बब्बर और मोनिका डोगरा दोनों ही बहुत सुन्दर लगे हैं और आमिर खान के क्या कहने पर कहानी कुछ भी बताने से चूकती है| अब मुझ जैसा औसत दिमाग वाला इस कहानी को नहीं समाझ पाया पर हो सकता है की यह कहानी किरण ने थोडा ऊँचे सोच वालों के लिए बनायीं हो| फिल्म का नाम धोबी घाट है पर धोबी घाट बमुश्किल ३ या ४ बार दिखाया गया है, इससे ज्यादा धोबी घाट तो मुन्नाभाई फिल्म में देखने को मिला था| अरुण पेंटर हैं पर पूरी फिल्म में उन्होंने बस एक पेंटिंग बनायीं है| हाँ शाई ने तस्वीरें बहुत ली हैं|खैर आमिर जैसे जबरदस्त अभिनेता ने कहीं न कहीं प्रोफेसनल और पर्सनल जिंदगी को मिलाया जिसके चलते शायद ऐसा हुआ| जो केवल आमिर खान को साल भर के बाद परदे पे देखने जाना चाहते है वह इसे देखने जरुर जाएँ| दर्शक जो केवल आमिर के नाम से जाते थे उन्हें कहीं न कहीं हताश होकर लौटना पड़ा|ये प्रयोग निश्चित तौर से असफल रहा और मुझे आमिर की अगली फिल्म का इन्तेजार रहेगा|
ये केवल मेरी राय थी, हो सकता है की मैं उतना ज्यादा न समझता हूँ तो जो बातें मैं फिल्म देखकर मैं नहीं सीख पाया वह अगर किसी को भी समझ आयीं तो मुझे लिखे sagargujrati1@gmail.com पर या यहाँ पर कमेन्ट के रूप में छोड़े| आप अपनी राय भी इस फिल्म के बारे में जरुर बताएं| मैं आपका आभारी रहूँगा| फिर मिलेंगे जल्दी ही|
मुझे अपना कीमती वक़्त देने के लिए धन्यवाद|
सागर गुजराती 

Tuesday, January 11, 2011

राम नाम कि लूट है प्यारे, लूट सके तो लूट

राम के नाम पे कुछ दे दे बाबा...मौला के नाम पे कुछ दे दे बाबा..अक्सर हम ऐसी आवाज़ ट्रेफिक सिग्नल के पास या किसी के मंदिर के आगे सुनते हैं और हम लोग जेब में से कुछ छुट्टे पैसे निकाल कर दे देते हैं| बस भगवान् के नाम पर लेनदेन की कहानी यहीं से शुरू हो जाती है और अब इसका व्यवसायीकरण हो चुका है| पर सोचने वाली बात यह है की सिग्नल पे खड़ा भिखारी खुद की परेशानिया न बताकर राम का नाम लेकर क्यूँ मांगता है| यह बात अब वह भी समझ चुका है की भारतीय जनता को राम के नाम पर ही लूटा जा सकता है| हालाँकि परोपकार करना या धर्म के नाम पे कुछ दान करना कतई गलत नहीं पर जरा सोचिये की अगर राम, कृष्ण, हनुमान इत्यादि  जैसे भगवान् के नाम का सहारा लेकर लोग आतंकवाद, राजनीती और तरह तरह के गैरकानूनी काम करें तो क्या इन लोगों का समर्थन हमें करना चाहिए?? अगर कोई पडोसी कुछ गलत करता है तो उसके खिलाफ सबसे पहले हम ही FIR दर्ज करते हैं पर कोई ढोंगी बाबा कुछ भी गलत करे हम उसे उसकी लीला मानते हैं| जी हाँ भगवान् के नाम का सहारा लेकर ही आज कई लोग जनता को बरगला रहें है और गैरकानूनी काम कर रहे हैं|सिग्नल पर राम नाम लेकर भीक मांगना तो एक छोटा सा चित्र है जहाँ भगवान के नाम पर लेन देन होता है पर अब यह ई कदम आगे बढ़ गया है| मंच पे बैठकर राम नाम के भजन गाना और कथा सुनना पहले एक धर्मार्थ का काम था पर आज इसका व्यवसायीकरण हो गया है| लोगों ने इसे भी धंधा बना दिया है| अब नए नए कथाकार आ गए हैं जो राम का नाम लेकर लोगों को लूटते है और अपने प्रभाव छेत्र से बहार निकलते ही जींस टी-शर्ट में आ जातें है और धर्म और कानून को ताक पे रखके सब गलत काम करतें है| कुछ कथा वाचकों ने तो ऐसे कम किये हैं जो की इंसानियत को तार तार कर के रख देती है| उनके ये काम भगवान् के नाम और साधुओं की शान को दागदार कर देते हैं| हाल ही में आये ऐसे वाकये इसका जीता जागता प्रमाण है| स्वामी नित्यानंद को आप लोग जानते ही होंगे| कर्नाटक के इस स्वामी की कई अष्लील क्लिपिंग जारी हुई जिसमे इसे कथित तौर पर तमिल कलाकार रंजीता के साथ अंतरंग अवस्था में देखा गया| इसको सन टीवी ने प्रसारित किया| उनके आश्रम में बाकायदा अनुबंध होता था जिसमें उल-जलूल और घुमावदार शब्दों का प्रयोग करके इन कामों के लिए राजी किया जाता था| और इस तरह से स्वामी यौन समागम के जरिये मोक्ष प्राप्त करने की बात कहता था| नित्यानंद पर बलात्कार, जमीन हड़पने, सोने की तस्करी करने, वन जीव सरक्षण कानून और विदेशी मुद्रा के नियमों का उल्लंघन करने का आरोप है पर उनका आश्रम इन सबसे इनकार करता है| क्या इस अपराधिक चव्वी के आदमी को स्वामी की संज्ञा दी जानी चाहिए??? पर इनके भक्त तो इनके इस कदर दीवाने हैं कि उन्हें यह सब दिखाई नहीं देता| ऐसे आरोपिओं कि फेहरिस्त लम्बी है| हाल ही में समझौता एक्सप्रेस मामले में स्वामी असीमानंद से पूछताछ हुई थी और अखबारों के अनुसार उसने अपना जुर्म कबूला| वो इन ब्लास्टों में किसी न किसी तरह शामिल था| सवाल तो ये है कि अगर वह स्वामी है तो जुर्म कैसा कबूला और अगर जुर्म कबूला तो स्वामी किस बात का?? साधू, कथावाचक, स्वामी जैसे शब्द अब धर्म से उतारकर अपराध, व्यवसाय आदि में आ गएँ है और साधू नाम कि आड़ लेकर लोग हर तरह के गलत काम बड़ी बेबाकी से कर रहें है| खुद गलत काम करके वो पूरी प्रजाति को कठघरे में ला खड़ा कर रहे हैं| साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पहले से ही मालेगांव बम्ब ब्लास्ट के केस में जांच के दायरे में है| अक्सर न्यूज़ चैनल में दिखाते रहते है कि आशाराम जी के आश्रम में बच्चों को काटा जा रहा है, बाबा राम रहीम मानव बम्ब तैयार कर रहे है| हाल ही में वृन्दावन के एक  कथावाचक कि एक इंसानियत को शर्म से झुका देने वाली घटना सामने आई| उसने अपनी पत्नी की 18 घंटे की ब्लू फिल्म बनायीं और अब इसे बाजार में बेचा जा रहा है| बताया जाता है की इसके देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हजारो शिष्य थे| वाह..देसी बाबा, विदेशी हरकतें| अगर कोई लड़का,लड़की को छेड़ दे तो पब्लिक उसे पकड़कर पीटने लगती है पर उसी पब्लिक में से बहुत से लोग बाबाजी के प्रवचन सुनने जरुर जाते हैं| अगर नेताजी किसी घोटाले में लिप्त हो जातें है तो उन्हें अगली बार नकार दिया जाता है तो फिर इन आरोपी बाबाओं के भक्त दिन पर दिन इतने बढ़ते क्यूँ जाते हैं?? क्या धर्म के नाम पर हम लोग इतने अंधे हो गए हैं की सही और गलत का फर्क ही भूल गए हैं?? भगवान की चार बातें करने वाला अगर कोई गैरकानूनी और अमानवीय काम करेगा तो क्या हम बर्दाश्त कर लेंगे? जिस भगवान् राम ने शबरी के झूठे बेर खाए थे उसी राम के नाम की आड़ लेकर कोई औरतों पे जुर्म कैसे कर सकता है? सोचने की बात यह है की इसमें गलती किसकी है?? सिर्फ और सिर्फ हमारी| ठण्ड में ठिठुरते गरीब को 2 रुपये देने से पहले 200 बार सोचते हैं और कथा में जाकर हजारों रुपये बाबाजी पे न्योछावर कर देते हैं| कुछ लोग घर पर बुजुर्ग माँ बाप को नहीं पूछते और बाबा जी के पैर छूकर दान देते है और अपना काला धन सफ़ेद बना लेते है| इस काले धन का इस्तेमाल काले काम में होता है| आखिर क्यूँ चाहिए हमे उस पवित्र भगवान और हमारे बीच में एक ठेकेदार?? जो अपने घर की औरतों की इज्ज़त नहीं कर सकता वह क्या भला हमें राम नाम का जाप कराएगा? और क्या प्रभु भक्ति में तल्लीन होने का यही एक तरीका है? भगवान् को अगर खोजना ही है तो अपने माँ बाप के अन्दर खोजो, किसी गरीब की मदद करके उसकी हंसती हुई शकल में खोजो, अपने गुरु की शकल में खोजो जिनकी दी हुई शिक्षा की वजह से आप बाबा को दान देने के काबिल बने हो| पर अक्सर लोग गुरुओं की इज्ज़त न करके इन लोगों को ही गुरु मान लेते हैं जो खुद को भगवान् का अवतार बताते हैं|
हमें खुद के अन्दर सुधार लाना होगा और समझना होगा कि केवल लगन, इमानदारी, मेहनत और परोपकार( जो सच में उस लायक हो) से ही सफलता मिलती है नाकि बाबा जी के लम्बे चौड़े आशीर्वादों से| ऐसा नहीं है कि इस छेत्र में अच्छे लोग नहीं हैं, पर दिन पर दिन अच्छे लोगों कि संख्या कम होती जा रही है| लोगों ने इसे धंधा बना लिया है और ईश्वर की आड़ लेकर अपना उल्लू सीधा कर रहे है| लेकिन जागरूक हमें होना है| हमे धर्म की असली परिभाषा को समझना होगा और ईश्वर के मार्ग पे चलने के लिए खुद आगे बढ़ना होगा..न की किसी धर्म के ठेकेदार की मदद से| अब तय हम लोगों को करना है कि हम धर्म के सार को समझकर अपना काम इमानदारी से करते रहेंगे या फिर यूँही राम के नाम पर लुटते रहेंगे|
अब आखिर में मैं वही कहूँगा जो हमेशा कहता हूँ कि अगर मेरी इस लेख में आपको कुछ भी गलती नजर आये या इस लेख से किसी कि भी भावना आहत हुई हो तो मुझे तत्काल बताएं| मेरी मंशा किसी को ठेस पहुँचाना नहीं है| आपके सहयोग कि मुझे दरकार है| आप अपने विचार मुझे sagargujrati1@gmail.com पर अवय्श्य भेजें| मैं आपका स्वागत करता हूँ और मेरा लेख पढ़ने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया| मैं आपका आभारी रहूँगा| फिर मिलूँगा किसी नए लेख या साक्षात्कार के साथ |
आपका आभारी,
 सागर गुजराती