भारत की राजनीति को जनता ने अब कई कदम आगे बढ़ा दिया है. इसका जीता जागता उदहारण देखने को मिला बिहार चुनाव के नतीजों के बाद. कल तक बिहार की राजनीति केवल रषूख वालों, दबंगों, जातिवाद और भाई भतीजावाद करने वालों के लिए होती थी पर आज वो जमाना हवा हो चुका है. जनता ने अब विकास का मुद्दा उठाया है और इसी क चलते नितीश कुमार को फिर से सत्ता की कमान सौंपी है. ये बात तो किसी से छुपी नहीं की बिहार में बीते दिनों में विकास कार्यों में तेजी आई. सरकें बनी, प्रशासन सुधरा, नए स्कूल कॉलेज खुले और ये सब हालाँकि पूरी तरह बिहार को विकसित नहीं करते पर फिर भी जनता को विकास की एक रोशनी तो नजर आ ही गई है.बिहार को अब तक देश के सर्वाधिक पिछरे प्रदेशों में से एक माना जाता था. यहाँ राजनीति के नाम पर दबंगई, घोटाले, बूथ कैपचुरिंग, मार पीट जैसी वारदातें होती रहती थी. पूरी तरह से जंगलराज था और जनता का स्तर हर मामले में नीचे था. लोग भाई भतीजावाद और जातिवाद के आधार पर वोट देते थे. पर इस बार बिहार की जनता ने केवल और केवल विकास को मुद्दा बनाया और ज़ातीय गोलबंदी से निकलकर अपना नेता चुना. हालाँकि इसका प्रमाण तो जनता ने २००९ के लोकसभा चुनाव में ही दे दिया था और बता दिया था की अब सत्ता में दबंगों का कोई काम नहीं. जनता ने उन्हें कुर्सी पर नहीं बल्कि सलाखों के पीछे रखना पसंद किया.चाहे वो पप्पू यादव जी हो या फिर मुख़्तार अंसारी जनता ने सबको ये बता दिया की अब वो परिपक्व हो गयी है और सही और गलत में अंतर समझती है. बिहार में हालाँकि साक्षरता रेट सबसे कम है फिर भी जनता ने बताया की वो चाहे अनपढ़ ही क्यूँ न हो पर विकास की समझ अच्छे से रखती है. चाहे वो नरेन्द्र मोदी हो या फिर प्रेम कुमार धूमल सबने ये दिखाया है की विकास के सहारे लम्बे समय तक अपनी पेठ जमाई जा सकती है.चाहे जनता किसी भी वर्ग कि हो, किसी भी जाति की क्यूँ न हो सबको सरके चाहिए, बिजली चाहिए, पानी चाहिए, शिक्षा चाहिए. बस बिहारीओं ने ये बखूबी समझ लिया है. कुल मिलाकर बिहार ने पूरे देश को एक सबक दिया है. हालाँकि नितीश के चहुमुखी विकास कि वजह से मीडिया में सब जानते थे कि वो दोबारा सत्ता में आयेंगे और जनता ने इसको साबित भी कर दिया. नीतीश के नेतृतव में राजग ने २४३ सीट में से २०६ हासिल की. यानि की 85 फीसदी सीट पर उन्होंने कब्जा किया.निश्चित रूप से ये उनकी विकास का परिचायक है. विकास और सुशासन अब बहुत आगे आ चुके हैं. नीतीश के साथ सुशिल कुमार मोदी को भी फायदा हुआ और वो फिर से उप-मुख्यमंत्री बने. नीतीश ने निश्चित तौर पर अपनी इंजीनियरिंग का जलवा social इंजीनियरिंग कर के दिखाया. नरेन्द्र मोदी को अपने चुनाव प्रचार में शामिल न करके कहीं न कहीं उन्होंने अल्पसंख्यकों के प्रति सुरक्षात्मक रवैया दिखाया. उन्होंने चुनाव प्रचार में भी जमकर खर्च किया.उनका जादू हर किसी पर सिर चड़कर बोला चाहे वोह युवा हो, बूढ़ा हो, महिला हो. लेकिन देखने वाली बात ये है की इस बार महिलायों के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई है. इस बार 55% महिलाओं ने वोट दिया जो की पिछली बार से करीब 10 % ज्यादा है. नक्सलीओं की धमकिओं का भी असर नहीं परा लोगों पे और उन्होंने बढ़कर अपना नेता चुना. लालू यादव जी और रामविलास पासवान का तो सुपरा साफ़ कर ही दिया और संग में बता दिया की राहुल गाँधी की मीठी बातें और यूथ कांग्रेस की जरुरत अभी बिहार को नहीं है.मैंने शुरू में जातिवाद का बहुत नाम लिया पर अगर देखा जाये तो नीतीश कुमार ने भी एक social इंजीनियरिंग के तहत जातिवाद किया. दलितों में भी महादलित, मुस्लिमों में पसमांदा मुस्लिम का विभाजन करके उन्होंने ये साबित कर दिया लेकिन फिर भी जनता ने इसे स्वीकारा.
लेखक की कलम से
बहुत बात कर ली आपसे नीतीश जी के विकास की पर अब अगर असलियत की बात करूँ तो कुछ ऐसे मसले है जिनकी तरफ नीतीश कुमार को ध्यान देना अति अति अति आवश्यक है. सबसे पहले तो मैं बता दूं की जिस सुशासन की बदौलत नीतीश ने फिर से सत्ता पाए थी उसपर धब्बा अभी कुछ दिन पहले तब लग गया जब पटना में सुर संग्राम के फिनाले में जनता ने बवाल मचा दिया और उस जगह पर वहां के राज्यपाल से लेकर भोजपुरी के कई सितारे मौजूद थे. लोगों ने परदे पे आग लगा दी, तोर फोर्र की और पोलिस प्रशासन उनको रोकने में नाकाम रहा. ये मसला था तो बहुत बार पर मीडिया में ज्यादा नहीं आया, कहीं न कहीं मीडिया की बाध्यता भी नजर आती है. जिस मीडिया ने ये दिखाया वो भी बहुत सूक्ष्म तरीके से दिखाया पर मेरे पटना में रहने वाले कुछ पत्रकार दोस्तों ने मुझे पूरा माजरा फोन पे बताया था. जीत के जश्न में नीतीश के कई विधायकों ने गोलिया चलाई थी जिसमे एक की मौत हो गई थी. ये सब सुशासन को तो नहीं दर्शाते.. अब अगर बात करें बिहार की तो असली बिहार पटना नहीं, बल्कि असली बिहार वो है जहाँ अभी भी ६०% लोग गरीबी रेखा के नीचे है यानि की अभी भी २० रुपये प्रतिदिन से भी कम की आय में गुजर बसर कर रहे है, असली बिहार वो है जहाँ किसान भुखमरी से आत्महत्या करता है, जहाँ पढ़े लिखे लोगों की संख्या बहुत कम है, शिक्षा के अभाव में युवा विख्यात की बजाई कुख्यात बनना पसंद करता है, निवेश ना के बराबर है,बाल श्रम अपनी चरम सीमा पे है. आज भी बिहार के लोग दुसरे प्रदेशों में पलायन कर रहे है केवल अपने आप को जिन्दा रखने क लिए वो हर तरह क छोटे काम करते हैं. बिहार के लोगों को बहार के प्रदेशों में प्रतारना झेलनी होती है और अब ये बात किसी से छुपी नहीं.तो अब अगर नीतीश के हाथ में जनता ने फिर से बिहार की कमान दी है तो निश्चित रूप से अब उनके सामने चुनौतिया भी दोगुनी हो गयी है क्यूंकि अब जनता उनसे पहले से ज्यादा आस लगाये बैठी है. अब देखना यह होगा की नीतीश जनता की उम्मीदों पर कितना खरे उतर पाते है और अगले पांच साल में बिहार को क्या देते है जो उसे अपनी पुराणी चावी से बाहर निकाले.हम तो नीतीश जी को एक बार बधाई देना चाहेंगे और आशा करेंगे की वो बिहार वासिओ की आँखों ने जो सपने देखे है उन्हें पूरा करे और अपने बिहार को बनाये एक उत्तम प्रदेश.मैं अभी बस एक छात्र हूँ और मुझे बहुत कुछ सीखना है और मैं जानता हूँ की इस आलेख में बहुत सी गलतिया होंगी तो मेरी आपसे गुजारिश है की आप मुझे मेरी गलतिया बताये ताकि मैं उसमे सुधार कर सकूँ .आपके कमेंट्स का मैं स्वागत करता हूँ. सागर गुजराती


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