Friday, January 21, 2011

धोबी घाट- किरण का असफल प्रयोग

Mr. Perfectionist आमिर खान जिन्होंने लगान,मंगल पाण्डेय,गजनी,थ्री इडियट्स जैसी शानदार,संदेशपूर्ण और मनोरंजक फिल्मों से दर्शकों के मन में एक ख़ास पहचान कायम की उनकी इस नयी फिल्म "धोबी घाट" को देखने जाने के लिए मैं आपको एक वजह भी नहीं बता सकता| ऐसा प्रतीत होता है कि आमिर ने ये फिल्म अपनी पत्नी किरण राव की भावनाओं में बह कर की है| आमिर खान  एक जबरदस्त अभिनेता हैं ऐसा सब जानते हैं पर यहाँ लगता ही नहीं कि उन्होंने अभिनय किया है| केवल "हाँ","ना","सार्री" और कुछ छोटे छोटे संवादों को बोलने के अलावा उन्होंने कुछ नहीं किया| किरण आमिर से अभिनय नहीं निकलवा पायीं और आमिर जिनकी हर अगली फिल्म पुरानी फिल्म से कहीं ज्यादा अच्छी होती है, ये फिल्म बहुत ज्यादा हल्की नजर आई| १ घंटा ४५ मिनट की इस फिल्म में न ही कोई ख़ास है, न ही गाना और ना ही कुछ ऐसा जो दर्शकों को लुभा पाए| आगरा शहर में ये किसी भी सिंगल स्क्रीन में नहीं लगी और मल्टीप्लेक्स में भी ज्यादा दर्शक नहीं बटोर सकी| फिल्म पूरे परदे पर नहीं दिखती है और ऐसा लगता है की आमिर पहले ही इस फिल्म का हश्र जानते थे इसलिए उन्होंने इसका प्रचार नहीं किया| कहाँ गजनी में उन्होंने दिल्ली में जाकर बाल काटे थे, थ्री इडियट्स में वेश बदलकर बनारस और कोल्कता जैसे शहरों में घूमे थे पर धोबी घाट में शांत पड़ गए| वो जानते थे की फिल्म का कोई औचित्य या नैतिक शिक्षा नहीं है| इसको बहुत ही शांत ढंग से रीलिज किया गया| मुम्बईया प्रष्टभूमि पर बनी फिल्म आखिरकार क्या दिखाना चाहती थी ये समझने में असफल रहे| मुम्बई पर और भी फिल्म बनी है जैसे प्राण जाये पर शान न जाये, वंस अपोन अ टाइम इन मुम्बई, वास्तव,सत्या जिनमे मुंबई के अलग अलग मुद्दों को बड़े ही बेहतरीन ढंग से पेश किया है| पर धोबी घाट समझने में खासी दिक्कत हुई|

कहानी मुंबई से शुरू होती  है| arun (आमिर खान) एक पेंटर हैं और अपनी पत्नी को तलाक देकर मुम्बई में रहते हैं पर ये तलाक वाली बात हमें आधी फिल्म में पता चलती है| आमिर एक प्रदर्शनी लगते हैं जिसमे उनकी मुलाकात शाई(मोनिका डोगरा) से होती है जो की पेशे से इन्वेस्टमेंट बनकर है और अमेरिका से मुंबई एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में आई हैं| वह फोटोग्राफी की भी बहुत शौक़ीन हैं| मुलाकात के बाद वह आमिर खान के साथ उनके घर चली ज़ाती हैं और नशे में धुत्त दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाता है| अगली सुबह अरुण शाई को सॉरी बोलता है और कहता है की वो कोई रिश्ता उससे नहीं रख सकता| शाई गुस्साकर चली ज़ाती है| आमिर को खुल के नशा करते दिखाया गया है और शुरू में बस एक लाइन दिखाई है    "CIGGARATE SMOKING IS INJURIOUS TO HEALTH" जोकि बहुत कम लोग पढते है| मुन्ना एक धोबी है जो की अभिनेता बनने के सपने से मुंबई आया था| लेकिन ख़ास बात ये है की इसे कभी भी audition तक देते नहीं दिखाया| वह रात में डंडा लेकर निकलता है और क्या करता है ये ढंग से समझ नहीं आया| बस फिल्म के आखिरी कुछ पल में उसे चूहा मरते दिखाया है| अरुण अपना घर बदल लेता है| शाई मुन्ना के जरिये अरुण का पता जानने की कोशिश करती है और एक पल पे ऐसा लगता है की वह अरुण से प्रेम करती है पर मुन्ना के प्रति उसका झुकाव देखकर इस बात को पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता| बिट्टू इसी बीच शाई से प्रेम करने लगा था| यह सब झोलम झोल देखकर लगा की शायद ये प्रेम कहानी होगी| पर मैं गलत निकला,ऐसा तो कुछ नहीं था| इसी बीच अरुण को अपने नए घर में कुछ सामान मिलता है जिसमे कि घर में पहले रहने वाली औरत की बनायीं हुई videos थे जो उसने अपने भाई के लिए बनायीं थी| अरुण उन्हें देखते हैं और उनसे जुड़ जाते है| आधी फिल्म की खपत इन  videos में ही हो गयी| अंतिम  विडियो में नसीमा बताती है की उसके पति ने दूसरी शादी कर ली है और कहती है की ये उसका आखिरी  विडियो है| आमिर सोचते हैं की नसीमा ने पंखे से लटककर जान दे दी थी और वह फूट  फूट कर रोतें हैं और अपना घर बदल लेतें हैं| इधर शाई भी अलग चली ज़ाती है और मुन्ना भी| मुन्ना शाई को अरुण का नया पता देता है पर शाई उसपर ध्यान नहीं देती| कहानी ख़तम होती है|
प्रतिक बब्बर और मोनिका डोगरा दोनों ही बहुत सुन्दर लगे हैं और आमिर खान के क्या कहने पर कहानी कुछ भी बताने से चूकती है| अब मुझ जैसा औसत दिमाग वाला इस कहानी को नहीं समाझ पाया पर हो सकता है की यह कहानी किरण ने थोडा ऊँचे सोच वालों के लिए बनायीं हो| फिल्म का नाम धोबी घाट है पर धोबी घाट बमुश्किल ३ या ४ बार दिखाया गया है, इससे ज्यादा धोबी घाट तो मुन्नाभाई फिल्म में देखने को मिला था| अरुण पेंटर हैं पर पूरी फिल्म में उन्होंने बस एक पेंटिंग बनायीं है| हाँ शाई ने तस्वीरें बहुत ली हैं|खैर आमिर जैसे जबरदस्त अभिनेता ने कहीं न कहीं प्रोफेसनल और पर्सनल जिंदगी को मिलाया जिसके चलते शायद ऐसा हुआ| जो केवल आमिर खान को साल भर के बाद परदे पे देखने जाना चाहते है वह इसे देखने जरुर जाएँ| दर्शक जो केवल आमिर के नाम से जाते थे उन्हें कहीं न कहीं हताश होकर लौटना पड़ा|ये प्रयोग निश्चित तौर से असफल रहा और मुझे आमिर की अगली फिल्म का इन्तेजार रहेगा|
ये केवल मेरी राय थी, हो सकता है की मैं उतना ज्यादा न समझता हूँ तो जो बातें मैं फिल्म देखकर मैं नहीं सीख पाया वह अगर किसी को भी समझ आयीं तो मुझे लिखे sagargujrati1@gmail.com पर या यहाँ पर कमेन्ट के रूप में छोड़े| आप अपनी राय भी इस फिल्म के बारे में जरुर बताएं| मैं आपका आभारी रहूँगा| फिर मिलेंगे जल्दी ही|
मुझे अपना कीमती वक़्त देने के लिए धन्यवाद|
सागर गुजराती 

5 comments:

  1. असफल पिल्‍म की सफल समीक्षा
    Amit Sharma
    journalist
    www.patrkar.com

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  2. safal film ki asafal samiksha aap ager is film ke bare me aur kuch janna chahte hai to pahle ye samjhiye ki cinema kya hai

    visit to my blog for read my view on that film http://lakulish.blogspot.com

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  3. aisi cinema kis kaam ki jo sirf aap jaise chand log hi smajh payen.......cinema ka matlab hamare lie entertainment with moral hai...yahan donon nahi the....

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  4. हर किसी के लिए Cinema का मतलब अलग होता है. और प्रत्येक Film , प्रत्येक दर्शक के taste को suit करे, ऐसा आवश्यक नहीं है. सागर-जी द्वारा इस समीक्षा में कथित बातें, कई दर्शकों के विचारों को व्यक्त करती हैं. परन्तु, जैसा कि आपने http://dolcenamak.blogspot.com/2010/09/namak-went-to-see-dhobi-ghat-at-tiff.html पर पढ़ा, यह एक अलग किस्म का Cinema है. निर्देशक किरण ने स्वयं ही कई interviews में कहा कि यह एक 'art film' है. शायद इसीलिए आमिर ने इसका प्रचार उस प्रकार नहीं किया जैसा की आपने उनकी पिछली फिल्मों के लिए देखा था.
    अपनी जगह पर यह एक slice-of-life फिल्म है [मुझे काफी पसंद आयी!], और कहानी में एक definite "start-body-conclusion" को ज़रूर निराश करेगी!

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  5. मुंबई शहर फिल्मकारों को आकर्षित करता रहा है। हिंदी फिल्मों में हर साल इसकी कोई न कोई छवि दिख जाती है। किरण राव ने धोबी घाट में एक अलग नजरिए से इसे देखा है। उन्होंने अरूण, शाय, मुन्ना और यास्मिन के जीवन के प्रसंगों को चुना है। खास समय में ये सारे किरदार एक-दूसरे के संपर्क और दायरे में आते हैं। उनके बीच संबंध विकसित होते हैं और हम उन संबंधों के बीच झांकती मुंबई का दर्शन करते हैं। किरण ने इसे मुंबई डायरी भी कहा है। मुंबई की इस डायरी के कुछ पन्ने हमारे सामने खुलते हैं। उनमें चारों किरदारों की जिंदगी के कुछ हिस्से दर्ज हैं। किरण ने हिंदी फिल्मों के पुराने ढांचे से निकलकर एक ऐसी रोमांटिक और सामाजिक कहानी रची है, जो ध्यान खींचती है।
    एकाकी अरूण किसी भी रिश्ते में बंध कर नहीं रहना चाहता। उसकी फोटोग्राफर शाय से अचानक मुलाकात होती है। दोनों साथ में रात बिताते हैं और बगैर किसी अफसोस या लगाव के अपनी-अपनी जिंदगी में मशगूल हो जाते हैं। पेशे से धोबी मुन्ना की भी मुलाकात शाय से होती है। शाय मुन्ना के व्यक्तित्व से आकर्षित होती है। वह उसे अपना एक विषय बना लेती है। उधर मुन्ना खुद को शाय के निकट पाता है। दूर सपने में उसे शाय की निकटता मोहब्बत जैसी लगती है। इधर नए मकान में आया अरूण एक वीडियों के सहारे यास्मिन के बारे में जानने-समझने की कोशिश करता है। मुंबई के ये चारों किरदार अलग-अलग वर्ग और स्तर के हैं। जाहिर सी बात है कि उनके अंतर्संबंधों में लगाव-अलगाव का एक वर्गीय तनाव है। वे न चाहते हुए भी उससे नियमित होते हैं। किरण राव हिंदी फिल्मों के मिथ और दर्शन को इन किरदारों के माध्यम से तोड़ती है। बगैर किसी नारेबाजी या स्पष्ट घोषणा के वह बता जाती हैं कि प्रेम का वर्गीय आधार होता है। यह फिल्म कई स्तरों पर मुंबई शहर की कहानी सुनाती है। फिल्म का शीर्षक एक रूपक है, जो बखूबी फिल्म के भाव को व्यक्त करता है।
    किरण राव ने किरदारों के चयन और गठन में भी हिंदी फिल्मों के पुराने समीकरणों का उपयोग नहीं किया है। अरूण, शाय, मुन्ना और यास्मिन जैसे किरदारों का हमने पहले पर्दे पर देखा है, लेकिन वास्तविक चरित्र के रूप में उनकी प्रस्तुति और उनका रियल परिवेश इसे फंतासी का रूप नहीं लेने देता। यहां निम्नवर्गीय मुन्ना का उच्च मध्यवर्गीय शाय से लगाव मोहब्बत में नहीं बदल पाता। उसके लिए किरण कोई नाटकीय स्थिति या ड्रामा नहीं क्त्रिएट करतीं। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग नैचुरल लाइट और रियल लोकेशन पर की गई है। अमच्योर किस्म के एक्टर अपने किरदारों को सहत और वास्तविक रहने देते हैं। यहां तक कि आमिर खान भी एक सामान्य किरदार के तौर पर पेश किए गए हैं। धोबी घाट एक सुंदर प्रयोग है। इसकी पटकथा मेंआगे-पीछे छलांग लगाती घटनाएं कई बार चौंकातीे हैं। खास स्टाइल में फ्लैशबैक या लीनियर कहानी देखने के आदी दर्शकों को यह फिल्म अजीब सी लग सकती है। वहीं विश्व सिनेमा से परिचित और अपारंपरिक विषयों के शौकीन दर्शकों को धोबी घाट संतुष्ट करेगी।
    धोबी घाट में अरूण के किरदार में आमिर खान को लेकर किरण राव ने जोखिम का काम किया है। इस फिल्म में वे अपने स्टारडम के बगैर हैं। अरूण को पर्दे पर साकार करने में उनकी मेहनत नजर आती है। वे स्वाभाविक नहीं लगते। उसकी वजह यह हो सकती है कि फिल्म देखते समय भारतीय दशर््क और खास कर हिंदी फिल्मों के दर्शक आमिर खान को उनकी इमेज से अलग अरूण के रूप मे नहीं देख पाएंगे। अगर एक सामान्य अभिनेता के तौर पर आमिर खान को देखें तो उन्होंने सहज दिखने और रहने की कोशिश की है। इस फिल्म की उपलब्धि मोनिका डोगरा और कृति मल्होत्रा हैं। दोनों का अपरिचित चेहरा उनके लिए मददगार साबित होता है। हम शाय और यास्मिन को उनके निभाए रूप में स्वीकार लेते हैं। प्रतीक निश्चित ही अपरंपरागत और प्रतिभाशाली अभिनेता हैं। उनमें हिंदी फिल्मों के अभिनेताओं के लटके-झटके नहीं हैं। उन्होंने मुन्ना के मनोभावों को दृश्यों के मुताबिक व्यक्त किया है। कुछ दूश्यों में वे बहुत प्रभावित करते हैं।
    धोबी घाट में मुंबई भी एक किरदार है। मुंबई शहर को हम अलग-अलग रूपों में हिंदी फिल्मों में देखते रहे हैं। किरण ने इस फिल्म में न तो उसे सजाया और न उसे विद्रूप किया है। इस फिल्म में मुंबई को उसकी वास्तविकता में देखना अच्छा लगता है।

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