कहीं दंगों की राजनीति तो कहीं नंगों की
इन दिनों देश की दो बड़ी पार्टियों के पास दो ही मुद्दे नज़र आते हैं। जहाँ एक तरफ सत्ता पर काबिज़ कांग्रेस के घोटालों और भ्रष्टाचार पर विपक्ष में बैठी भाजपा खुलकर निशाना साधती है तो कभी विदेश नीति की विफलता और महंगाई पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देती है. लेकिन भाजपा के उच्च कोटि के नेता ये भूल जाते हैं कि इनके शासन में इनके ही नेता बंगारू लक्ष्मण कैमरे के सामने मात्र एक लाख रुपये लेते हुए देखे गए थे. इनके साथ रहे कर्णाटक के येदुरप्पा और बेल्लारी बंधू अवैध खनन के काम में सालों से लिप्त है। महंगाई की
बात करी जाए तो भाजपा सरकार में प्याज के दामों की वजह से हुई छीछालेदर तो सबको याद होगी ही। क्या कंधार हाइजेक काण्ड में छोड़े गए आतंकियों के मुद्दे को विदेश नीति की विफलता नहीं माना जा सकता? आज वो ही आतंकी भारत के खिलाफ हजारों आतंकियों को ट्रेनिंग दे रहा है और हर रोज भारत के पतन के तरीके ढून्ढ रहा है.
दूसरी तरफ जैसे जैसे भाजपा में मोदी का कद बढ़ रहा है और शीर्ष के नेता भी मोदी के नाम के जयकारे लगाते दिख रहे हैं कांग्रेस और उसके चाहने वाले भाजपा की हिंदुत्व छवि और गुजरात में हुए दंगों पर राजनीति कर वोट बैंक बांटने में जुटे हैं . गुजरात में जो 2002 में हुआ वो बेहद निंदनीय था और मानवता को शर्मशार कर देने वाला था . हालाँकि मोदी ने ये तक कह दिया कि अगर वो गुनेहगार निकले तो उन्हें बीच सड़क पर फांसी दे दी जाये. ये अलहदा बात है लेकिन कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष बनकर प्रचार कर रही है लेकिन इतिहास के पन्नों को कुरेदने पर पता चलता है कि कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्ष का चोला सिर्फ वोट बैंक के लिए पहना है जैसा अब भाजपा कर रही है . कांग्रेस के नेता और भारत का बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग आखिर गुजरात
के उन 1969 के दंगों को क्यों भूल जाते हैं जिनमें 2000 लोगों की जानें गयी
थी..लाखों लोगों का घर बर्बाद हुआ था..तब कांग्रेस के हितेंद्र देसाई
मुख्यमंत्री थे . लेकिन शायद ही कोई अब इन दंगों का जिक्र करता हो. क्या ये निंदनीय नहीं? क्या कई साल बीत जाने से पार्टी धर्मनिरपेक्ष ब्रांड हो जाती है? चलिए थोडा और देखें तो 1980 में मुरादाबाद में हुए दंगों में लगभग दो हज़ार लोग मरे थे तब भी कांग्रेस शासन था ..1984 के सिख विरोधी दंगे तो आजकल फिर सुर्ख़ियों में हैं . भागलपुर में 1989 में हुआ दंगों अब तक के दंगों से कहीं ज्यादा वीभत्स है..इसमें भी कांग्रेस राज कर रही थी ..1985 में फिर गुजरात में दंगे हुए तब भी कांग्रेस शासन में थी ..
1967 में रांची में हुए दंगे में सैकड़ों लोग मरे तब भी कांग्रेस शासन था ..
सत्य तो ये है कि नेता हाथ में डमरू लिए हमारे पास आते हैं और हम इनके डमरू पर नाचते दीखते हैं. किसी पार्टी को घोटाले की वजह से खींचते हैं और दुसरे के वोट बैंक बन जाते हैं और किसी को धर्म के नाम पर खींचकर उससे मूंह फेर लेते हैं जबकि ये सारे मुद्दे, आरोप, बुराइयां हर पार्टी में मौजूद हैं .
लेकिन हम इनकी चाल का शिकार होते रहते हैं और इसलिए ये नेता अपनी चाल बदलना भी नहीं चाहते .
अंत में बस कुछ पंक्तियाँ कहूँगा,
ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
गरीब महंगाई से मर रहा हो तो नहीं आ पाते,
पर उद्योगपति के बुलावे में "आ" जाते हैं...
अमीरों के महलों को खड़ा करवाने के खातिर,
गरीबों की बस्ती "जला" जाते हैं...
ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
समाजवाद की आड़ में बढ़ाते हैं पूँजीवाद,
और धन का लालच देकर वोट "पा" जाते हैं,
हम गरीबों पर बढ़ा कर टेक्स का बोझ,
सारी कमाई चटकारे लगा कर "खा" जाते हैं...
ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
मुझ जैसे गरीबों के वोट के खातिर,
मेरी बस्ती में आकर "गिड़गिड़ा" जाते हैं,
और जीतने के बाद गर हम मिलना चाहें,
तो सामने से ठेंगा "दिखा" जाते हैं....
ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
बात करते हैं "सुशासन" की चिल्ला चिल्ला कर,
पर देश के "दुशासन" की फाइलें दबा जाते हैं,
पेट्रोल की कीमत चंद पैसे कम करके,
देश भर की मीडिया में "छा" जाते हैं...
इन दिनों देश की दो बड़ी पार्टियों के पास दो ही मुद्दे नज़र आते हैं। जहाँ एक तरफ सत्ता पर काबिज़ कांग्रेस के घोटालों और भ्रष्टाचार पर विपक्ष में बैठी भाजपा खुलकर निशाना साधती है तो कभी विदेश नीति की विफलता और महंगाई पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देती है. लेकिन भाजपा के उच्च कोटि के नेता ये भूल जाते हैं कि इनके शासन में इनके ही नेता बंगारू लक्ष्मण कैमरे के सामने मात्र एक लाख रुपये लेते हुए देखे गए थे. इनके साथ रहे कर्णाटक के येदुरप्पा और बेल्लारी बंधू अवैध खनन के काम में सालों से लिप्त है। महंगाई की
बात करी जाए तो भाजपा सरकार में प्याज के दामों की वजह से हुई छीछालेदर तो सबको याद होगी ही। क्या कंधार हाइजेक काण्ड में छोड़े गए आतंकियों के मुद्दे को विदेश नीति की विफलता नहीं माना जा सकता? आज वो ही आतंकी भारत के खिलाफ हजारों आतंकियों को ट्रेनिंग दे रहा है और हर रोज भारत के पतन के तरीके ढून्ढ रहा है.
दूसरी तरफ जैसे जैसे भाजपा में मोदी का कद बढ़ रहा है और शीर्ष के नेता भी मोदी के नाम के जयकारे लगाते दिख रहे हैं कांग्रेस और उसके चाहने वाले भाजपा की हिंदुत्व छवि और गुजरात में हुए दंगों पर राजनीति कर वोट बैंक बांटने में जुटे हैं . गुजरात में जो 2002 में हुआ वो बेहद निंदनीय था और मानवता को शर्मशार कर देने वाला था . हालाँकि मोदी ने ये तक कह दिया कि अगर वो गुनेहगार निकले तो उन्हें बीच सड़क पर फांसी दे दी जाये. ये अलहदा बात है लेकिन कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष बनकर प्रचार कर रही है लेकिन इतिहास के पन्नों को कुरेदने पर पता चलता है कि कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्ष का चोला सिर्फ वोट बैंक के लिए पहना है जैसा अब भाजपा कर रही है . कांग्रेस के नेता और भारत का बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग आखिर गुजरात
के उन 1969 के दंगों को क्यों भूल जाते हैं जिनमें 2000 लोगों की जानें गयी
थी..लाखों लोगों का घर बर्बाद हुआ था..तब कांग्रेस के हितेंद्र देसाई
मुख्यमंत्री थे . लेकिन शायद ही कोई अब इन दंगों का जिक्र करता हो. क्या ये निंदनीय नहीं? क्या कई साल बीत जाने से पार्टी धर्मनिरपेक्ष ब्रांड हो जाती है? चलिए थोडा और देखें तो 1980 में मुरादाबाद में हुए दंगों में लगभग दो हज़ार लोग मरे थे तब भी कांग्रेस शासन था ..1984 के सिख विरोधी दंगे तो आजकल फिर सुर्ख़ियों में हैं . भागलपुर में 1989 में हुआ दंगों अब तक के दंगों से कहीं ज्यादा वीभत्स है..इसमें भी कांग्रेस राज कर रही थी ..1985 में फिर गुजरात में दंगे हुए तब भी कांग्रेस शासन में थी ..1967 में रांची में हुए दंगे में सैकड़ों लोग मरे तब भी कांग्रेस शासन था ..
सत्य तो ये है कि नेता हाथ में डमरू लिए हमारे पास आते हैं और हम इनके डमरू पर नाचते दीखते हैं. किसी पार्टी को घोटाले की वजह से खींचते हैं और दुसरे के वोट बैंक बन जाते हैं और किसी को धर्म के नाम पर खींचकर उससे मूंह फेर लेते हैं जबकि ये सारे मुद्दे, आरोप, बुराइयां हर पार्टी में मौजूद हैं .
लेकिन हम इनकी चाल का शिकार होते रहते हैं और इसलिए ये नेता अपनी चाल बदलना भी नहीं चाहते .
अंत में बस कुछ पंक्तियाँ कहूँगा,
ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
गरीब महंगाई से मर रहा हो तो नहीं आ पाते,
पर उद्योगपति के बुलावे में "आ" जाते हैं...
अमीरों के महलों को खड़ा करवाने के खातिर,
गरीबों की बस्ती "जला" जाते हैं...
ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
समाजवाद की आड़ में बढ़ाते हैं पूँजीवाद,
और धन का लालच देकर वोट "पा" जाते हैं,
हम गरीबों पर बढ़ा कर टेक्स का बोझ,
सारी कमाई चटकारे लगा कर "खा" जाते हैं...
ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
मुझ जैसे गरीबों के वोट के खातिर,
मेरी बस्ती में आकर "गिड़गिड़ा" जाते हैं,
और जीतने के बाद गर हम मिलना चाहें,
तो सामने से ठेंगा "दिखा" जाते हैं....
ये हैं "नेता" मेरे देश के, मेरे प्रदेश के,
बात करते हैं "सुशासन" की चिल्ला चिल्ला कर,
पर देश के "दुशासन" की फाइलें दबा जाते हैं,
पेट्रोल की कीमत चंद पैसे कम करके,
देश भर की मीडिया में "छा" जाते हैं...

सबको तो मौका दे कर देख लिया है इस बार किसी नए को मौका देना चाहिए !
ReplyDeleteबहुत अच्छा कटाक्ष है.. साधुवाद..
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