Friday, May 3, 2013



भारतीयों के विदेशी संस्करण 


हाल ही में हुए तीन वाकयों ने इस मुद्दे पर कलम चलाने को मजबूर कर दिया. एक मित्र के भाई पिछले कई सालों से मालदीव में नौकरी करते थे. वो वहां एक कम्पनी में मेनेजर थे. हाल ही में उनका एक दिन फोन आया कि वो भारत वापस आ रहे हैं. भारत वापस आने के बाद उन्होंने वहां जाने से मना कर दिया. उन्होंने बताया कि अब भारतीयों के लिए वहां कई परेशानियां हैं. मालदीव सरकार ने भारतीय कम्पनी जीएमआर को कोर्ट के आदेशों के बावजूद अपने देश में बाहर का रास्ता दिखा दिया और उसकी जगह चाइना की एक कम्पनी ने उन्ही कामों को टेकओवर कर लिया जो पहले भारत की जीएमआर करती थी.
खैर, दूसरा केस शायद सबको ही पता हो. साउदी अरबिया में भारत के कई लोग नौकरी करने जाते हैं. साउथ से कई लोग बहुत सालों से वहां नौकरी कर रहे थे. अब वहां निताकत नाम का एक कानून लागू हो गया जिसके तहत साउदी अरब की नौकरियों में वहां के ही लोगों को वरीयता दी जायेगी और पैसे भी कहीं ज्यादा देने होंगे. इससे भारतियों की नौकरी में कटौती की गयी, छंटनी की गयी और वहां के लोगों को भर्ती किया गया. पिछले महीने से अब तक भारतीय लोग वहां से वापस आ रहे हैं.
तीसरा घर के पास के ही एक सज्जन का है. एक लड़का जो दिल्ली की एक कम्पनी में बड़ी पोस्ट पर है. किसी लड़की से कई सालों से अफेयर था. शादी की बात हुई. लेकिन, अचानक ही लड़की की शादी के लिए किसी एनआरआई का रिश्ता आ गया. लड़की के घरवालों ने उसको वरीयता दी और अब लड़की शादी करके दुसरे देश उड़ान भरने को तैयार है.
सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य लेकिन बचपन से ही मैंने कान्वेंट स्कूल की शक्ल देखी थी. मेरे कई मित्र थे जो हिंदी की क्लास में पीछे की सीट पर सो जाया करते थे. उनका सपना तो बाहरवीं के बाद भारत छोड़ किसी और देश में जाने का था. वो दिन भर बाहर के देशों का राग अलापते थे. भारत की विभिन्न बुराई गिनाते थे. रॉक एवं पाप सांग गाते थे. अमरीका के झंडे को अच्छा बताते थे. और मैं यकीन के साथ कहता हूँ कि आप लोगों के पहचान में भी ऐसे कई बेवकूफ भरे होंगे. उनके लिए ये देश माँ समान या भगवान् समान नहीं बल्कि एक दलदल मात्र है. उन्होंने इस बात पर गर्व है कि वो फर्राटेदार अंग्रेजी में चपरा लेते हैं. उनके घरवालों को इस बात पर गुरूर था कि उनके बच्चों के कुछ दोस्त भारत से बाहर के हैं. काशी के घाटों पर देखा, अंग्रेजों से कुछ लोग भारत की तारीफ नहीं बल्कि उनके ही देश की तारीफ कर दिया करते हैं. वैसे मैं थोडा फक्कड़ किस्म का इंसान हूँ. लोगों से मिलना, जुलना, चीख चीख के अपने विचारों को झेलने पर मजबूर कर देना मेरी आदतों में शुमार है. इसलिए अक्सर ऐसे लोग मिल जाते हैं जो केवल और केवल भारत की बुराई करते हैं. उनकी जुबान पर अक्सर ये रहता है,
“भारत में कुछ नहीं, भारत की फ़िल्में गन्दी, भारत के लोग गंदे, भारत के नेता गंदे, भारत की जगह गन्दी आदि आदि”
आज भी कई ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ इसलिए गुरूर है कि उन्हें हिंदी बोलनी नहीं आती. जो अंग्रेजी को पढ़े लिखे का पैमाना समझ लेते हैं.
बेहतर है कोई ऐसा कानून बने जो इन लोगों को इनके पसंदीदा देश की सिटिज़नशिप दिलवा दे और नमस्ते बोलके कह दे कि “फिर न आना इस देश”. कम से कम बचे लोगों में देश के लिए कुछ तो प्रेम भावना होगी. लेकिन दुसरे देशों की इस मामले में तो तारीफ करूँगा कि वहां के लोग अपने देश की बुराई नहीं सुनते. भले ही वो बड़ा देश अमरीका हो या बदनाम देश पाकिस्तान. अजीब ही बात है कि हम लोग खाते यहाँ का है और वाह वाही करते हैं दुसरे देश की. आखिर इसे कहते हैं देशप्रेम. झंडा लेकर स्वतंत्रता दिवस पर अखबार में फोटो खिंचा ली और अगले ही दिन फिर शुरू कर दी देश की बुराई. ये लोग क्यों भूल जाते हैं कि अगर नेहरु, गाँधी ने भी ये सोच लिया होता तो आज भी देश फिरंगियों के हाथों में होता. अगर अब्दुल कलाम साहब ने ये सोच लिया होता तो हमारे यहाँ बनी मिसाइलें आज दुसरे देश में बनती और हम पर दागी जाती. मैं तो उस जगह से हूँ जहाँ बिस्मिल्लाह खान साहब जैसी हस्तियाँ थी जिन्हें पूरा विश्व जानता था और उन्हें शेहनाई बजाने के लिए न्योता देता था लेकिन वो अपनी शर्तों पर जाते थे. जब उनका अंतिम समय था तब भी वो छोटे से घर में थे जबकि चाहते तो पूरी जिंदगी में न जाने कितने महल, न जाने कितने देशों में बना लिए होते.
आस्ट्रेलिया की घटना याद है ना किस तरह से भारतीय छात्र पर नस्लीय हमला हुआ था. मालदीव, सउदी अरब, दुबई में भी काम करने जैसे हालत नहीं. ऐसा खुद वहां से लौटे लोग बताते हैं. इंडिया टुडे के एक अंक में साउदी अरब से वापस लौटे लोगों के साक्षात्कार छपे हैं. यदि हो तो देखिएगा. और बात ये भी सही है कि हम भारतीय खुद में इतना दमखम रखते हैं कि पूरी दुनिया को अपने हुनर का लोहा मनवा सके. हाल ही में एक भारतीय इंजिनियर को बिल गेट्स के बाद सबसे ज्यादा बोनस दिया गया. 
हमने इस मिटटी में जन्म लिया है. माना कि देश में हज़ार कमियाँ होंगी लेकिन अगर हमारे घर में कमी है तो उसे हमें सुधारना है ना कि दूसरी देश में पलायन करना है. दुसरे देशों से सीखना तो अच्छा है लेकिन सीखकर अपने देश में इस्तेमाल करा जाए तो बेहतर है. जब तक हम ही अपने देश पर गर्व नहीं करेंगे तो सामने वाला क्यों हमारे देश को महत्त्व देगा?
लोग शायद हमारी इसी कमजोरी का फायदा अक्सर उठाते रहते हैं. कई लोग ये जानते हैं कि हमारे कुछ लोगों की देशभक्ति केवल युद्ध के समय थोड़े देर के लिए जाग्रत होती है . जय हो . उम्मीद है फिरंगियों के ये भारतीय संस्करण जल्द ही सुधरेंगे. 

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